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Thursday, January 24, 2013

लम्हा


घर में अकेली बैठी फरहाना की तंद्रा फोन की घंटी बजने से टूटी| उसने फोन उठाया और बात की, फोन रेडियो स्टेशन से शुभांगी  ने किया था| शुभांगी ने बताया कि वह रेडियो एफ.एम में काम करती है| उसका फोन नंबर उसके एक मित्र ने दिया है| असल में शुभांगी ने उसे  रेडियो स्टेशन पर बुलाने के लिए ही फोन किया है| रेडियो से बुलावे को फरहाना ने  सहर्ष स्वीकार कर लिया थाफरहाना एक भोली-भाली  और आकर्षक व्यक्तित्व की है| उसकी उम्र लगभग पैंतीस साल की होगी उसके परिवार के नाम पर पति और सास ससुर हैं| उसकी शादी को चार बरस बीत चुके हैं| वह अपने इस छोटे परिवार के साथ बहुत खुश है| हर समय घरवालों की खोजी नजरें उसे अंदर ही अंदर परेशान करती रहती हैं| घर के सभी सदस्यों को एक बच्चे की चाह है, जिसे वह अभी तक पूरी नहीं कर सकी है| बाहरी तौर पर  घरवाले यही जताते कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि संतान अभी हो या बाद में| किन्तु अंदर ही अंदर वे एक आस लगाए बैठे है कि वह शुभ घड़ी कब आएगी  जब उनके घर में भी बच्चे की किलकारियां गूंजेंगी|

फरहाना का पति साजिद एक  सॉफ्टवेर कम्पनी में सॉफ्टवेर इंजीनियर के तौर पर कार्य कर रहा है| वह स्वयं भी  तो एक सॉफ्टवेर कम्पनी में काम करती है| अच्छा वेतन, खुद का फ्लैट, कार, या यूँ कहें कि खुश रहने की सभी सुख-सुविधाएँ उस घर में मौजूद हैं| अगर कमी है किसी चीज की तो वह एक बच्चे की| शादी के कुछ वर्षों तक तो सब ठीक-ठाक चलता रहा लेकिन बूढ़े सास-ससुर की चाह को पूरा न कर पाने के कारण वह काफी मानसिक तनाव में रहने लगी| अपने इस मानसिक तनाव को दूर करने के लिए उसने बच्चा गोद लेने का फैसला किया| इसके लिए वह अनाथालय भी गई| उसने वहाँ एक बच्ची को पसंद किया लेकिन घरवालों की स्वीकृति न मिलने के कारण उसे अपना फैसला बदलना पड़ा| बच्चों के प्रति अपनी ममता को वह और ज्यादा दिन न रोक सकी| बच्चा भले ही गोद न ले सकी लेकिन पर बच्चों के प्रति अपनी ममता को भी न रोक सकी| इसलिए उसने सोचा कि बच्चा गोद नहीं लिया जा सकता तो क्या हुआ? ऐसे अनाथ बच्चों के लिए काम तो किया जा सकता है| उस दिन से ही उसने अपने आप को एक ऐसी स्वयं सेवी संस्था से जोड़ लिया जो गरीब और अनाथ बच्चों के लिए काम करती है|

 समय के साथ-साथ उसने अपने जीवन से समझौता कर लिया| गरीब और अनाथ बच्चों की देख-रेख को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर वह आगे बढ़ने लगी| उसकी इस पहल में वह अकेली नहीं थी| उसके इस कार्य को देखकर उसके अन्य सहयोगी भी उसके साथ जुड़ गए| सब ठीक-ठाक चल रहा था| एक दिन अचानक उसकी तबीयत खराब होने के कारण अस्पताल में भर्ती करवाया गया| डॉक्टर ने उसका चैकप किया कुछ दवाइयाँ लिखकर दे दीं| एक-दो दिन में वह ठीक हो गई और फिर उसी व्यस्तता में जुट गई| समय के साथ-साथ फरहाना का काम भी बढ़ता जा रहा था| एक तरफ दिन-प्रतिदिन ऑफिस का बढ़ता काम दूसरी तरफ उन गरीब अनाथ बच्चों की देख-रेख| उसने अपने आप को इन कामों में इतना व्यस्त कर लिया कि अपनी तबीयत के प्रति कोई चिंता ही नहीं थी| इन बच्चों के बीच रहकर, उनके लिए काम करके उसे एक आत्मीय सुख की अनुभूति होती थी| आखिर इन्सान का शरीर बना तो हाड़ माँस का ही ना? अपनी बीमारी की अनदेखी के कारण कुछ ही महीनों में धीरे-धीरे उसकी  तबीयत फिर से खराब रहने लगी| अपने स्वास्थ्य की अनदेखी के कारण इस बार उसकी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो गई थी| उसकी इस स्थिति को देखते हुए डॉक्टर ने बारीकी से जाँच पड़ताल की और कुछ टेस्ट करवाए| जाँच पड़ताल करने के बाद डॉक्टर ने कैंसर होने की बात बताई| 

फरहाना को कैंसर की बीमारी होने की बात सुनकर साजिद को डॉक्टर की कही बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ| उसने डॉक्टर को फिर से फरहाना स्वास्थ्य की जाँच करने के लिए कहा, लेकिन  डॉक्टर ने उसे समझाया कि उसने यह बात पूरी जाँच पड़ताल करने के बाद ही कही है| इस खबर को सुनकर फरहाना के होश उड़ गए| एक ही पल में उसे लगा जैसे उसके शरीर में प्राण ही नहीं हैं| कुछ देर डॉक्टर के क्लिनिक में बैठने के बाद वे लोग अपने घर के लिए निकले| घर आते समय दोनों के बीच एक गहरी खामोशी थी, दोनों के मन में एक मानसिक द्वंद्व था| कुछ समय बाद साजिद ने देखा कि फरहाना गहरी चिंता में डूबी हुई है| दोनों के बीच की खामोशी भी एक दूसरे से बहुत कुछ कह रही थी| साजिद  उसे सब कुछ ठीक होने का दिलासा देना चाहता था पर कह न सका| फरहाना ने उस खामोशी में साजिद की तरफ देखा जैसे वह भी उससे यही कहना चाह रही हो कि सब कुछ ठीक हो जायेगा. लेकिन..............इस खामोश सफर पर चलते हुए वे दोनों अपने घर जा पहुँचे| 

घर पहुँचकर फरहाना किसी से बात किए बिना सीधे अपने कमरे में चली गई| साजिद बाहर बैठक में जाकर बैठ गया| उसे लग रहा था मानो आज वह संसार में एक दम अकेला हो गया है| उसके दिल की धड़कने धीरे-धीरे तेज होती जा रही थीं| तरह–तरह के ख्याल उसके मन में आने लगे| इस खबर को अपने घरवालों से कैसे कहे? यही सोच रहा था कि उसकी माँ रसोई से बाहर आई और उसके इस तरह चिंतित बैठने का कारण पूछा| माँ को सामने देखकर साजिद  अपने आप पर काबू न रख सका| अब तक जिस दुःख दर्द को रोक रखा था| उसकी आँखों से छलक आया| जवान बेटे की आँखों में आँसू देखकर माँ घबरा गई| वह उसके पास बैठ गई| माँ को अपने पास बैठा पाकर वह उनकी गोदी में लेट गया और फूट-फूटफूटकर रोने लगा| कुछ देर तो माँ की समझ में कुछ नहीं आया| माँ ने उसे शांत किया और उसके इस प्रकार रोने का कारण जाना तो उनके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई| इसी बीच साजिद के पिता भी वहाँ आ चुके थे| दोनों माँ-बेटे को गंभीर बैठे देखकर उन्होंने भी पूछ लिया कि "क्या बात है दोनों माँ-बेटे इस प्रकार क्यों बैठे हैं"? जब उन्हें इस गंभीर विषय के बारे में पता चला तो वे भी इस बात को सुनकर सन्न रह गए| इस खबर ने हँसते-खेलते परिवार में  मातम का सा माहौल बना दिया| घर में सन्नाटा पसरा रहा| कुछ देर बाद साजिद ने अपने माता-पिता से कहा कि अब जो हो गया है उसे बदला तो नहीं जा सकता पर हाँ फरहाना की जितनी भी बची-खुची जिन्दगी है| उसमें वह उसे सारी खुशियाँ देना चाहता है| इसीलिए उसने अपने माता-पिता से वादा लिया कि वे लोग भी फहराना को खुश रखने में उसकी हर संभव सहायता करेंगे कहते –कहते उसकी आँखें फिर से छलक आईं| वह नहीं चाहता कि उसके दुःख का तनिक भी आभास फरहाना को हो| अपने दुःख को उसके सामने जाहिर करके उसे और परेशान नहीं करना चाहता| इतना सब कुछ होने के बाद कभी भी उसने अपने व्यवहार में तनिक भी दया या करुणा की भावना फरहाना को महसूस नहीं होने दी| उसका व्यवहार वैसा ही रहा जैसा पहले था|

आज फरहाना रेडियो एफ.एम पर शुभांगी के निमंत्रण पर आई है| शुभांगी रेडियो एफ.एम की एम. जे है| शुभांगी से कुछ देर बातें करने के बाद वे दोनों स्टूडियो के अंदर चली गई| कुछ ही समय में उनका शो शुरू हुआ|  
  
शुभांगी – नमस्ते दोस्तों  ...... आप सुन रहे हैं रेडियो एफ. एम. मैं शुभांगी| आज  चल रहा है 

आपकी पसंद प्रोग्राम| हमारे साथ हैं फरहाना| फरहाना जी स्वागत है आपका इस शो में| फरहाना 

मुझे सिर्फ आपका नाम पता है आपके बारे में मैं और कुछ नहीं जानती|

फरहाना – धन्यवाद| शुभांगी .....मैं एक ऐसी संस्था से जुड़ी हुई हूँ जो समाज के गरीब अनाथ बच्चों के लिए काम करते हैं| मेरी कोशिश रहती है कि ऐसे बच्चों का स्कूली शिक्षा के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास भी हो सके| जिससे कि ये  लोग भी समाज के साथ कदम-से कदम मिलाकर चल सकें|
शो के दौरान उसने अपने दोस्तों के लिए, रिश्तेदारों के लिए तरह-तरह के अपने पसंद के गाने सुनवाए| उसने जितने भी गाने सुनवाए  उन सब गानों से उसकी कोई न कोई याद जुड़ी थी| उन गानों के जरिये वह अपने उन पलों को याद कर रही थी जो उसने अपने माता-पिता, बहन और दोस्तों के साथ बिताए थे|

इस एक घण्टे के शो में शुभांगी और फरहाना की काफी बातें हुई| शो अपने अंतिम पड़ाव पर था और फरहाना को अपना अंतिम गाना सुनवाना था तब शुभांगी ने  कहा-
 
शुभांगी -  फरहाना अब  हमारे इस शो का आखिरी गाना  सैंया.....जिसे कैलाश खैर ने बहुत ही खूबसूरती के साथ गाया है| इस गाने को आप किसके लिए सुनवाना चाहती हो|

फरहाना – इस गाने को मैं अपने पति जिनका नाम साजिद है को डेडीकेट करना चाहती हूँ| साजिद को लगता है जैसे मैं उनसे प्यार नहीं करती| पर सच तो यह है कि मैं उन्हें अपने आप से भी ज्यादा प्यार करती हूँ| यह गाना खासकर उनके लिए ....... 

शुभांगी – फरहाना आप गाती भी हो...?
फरहाना – हाँ कभी-कभी .....
शुभांगी – फिर तो साजिद जी के लिए इस गाने की कुछ लाइन आप गा कर सुना दें........
फरहाना -  हीरे मोती मैं ना चाहूँ ........ मैं तो चाहूँ संगम तेरा ......
           मैं तो तेरी ......सैंया .....तू है मेरा............सैंया ....
           तू जो छू ले प्यार से ...............आराम से मर जाऊं........ |
 गाते हुए उसकी आँखें नम  हो चुकी थीं| लेकिन अपने आप पर काबू रखते हुए उसने शुभांगी को यह आभास नहीं होने दिया कि उसे किसी प्रकार का कोई दुःख भी है|

शुभांगी – क्या बात है ......आप तो बहुत अच्छा गाती हैं|
फरहाना- बस ......... यूँ ही गुनगुना लेती हूँ |  
इस गाने के बाद शुभांगी ने अपने सभी श्रोताओं और फरहाना को धन्यवाद कहा| इसी के साथ उसने अपना शो समाप्त किया| इस प्रकार शो खत्म हुआ दोनों स्टूडियो से बाहर आईं| बाहर फरहाना का मित्र सुमित उनका इन्तजार कर रहा था| अपने मित्र को देखकर फरहाना बहुत खुश हुई| सुमित वही  है जिसने फरहाना का फोन नंबर शुभांगी को दिया था| शुभांगी भी उसे अपने  रेडियो स्टेशन में देखकर बहुत खुश हुई| तीनों के बीच कुछ संवाद हुए| सुमित ने उसके शो के बारे में पूछा -

सुमित – फहराना कैसा रहा तुम्हारा शो |
फरहाना – मुस्कुराते हुए ... एक दम बढिया.....बड़ा मज़ा आया शुभांगी के साथ बातें करके|  थैंक्स  सुमित तुम्हारा यह सरप्राइज़ बहुत ही अच्छा था .....यार मेरा भी एक सपना था कि मैं भी एम. जे  बनूँ. पर वह सपना तो पूरा ना हो सका| पर आज तुम्हारी वजह से कम से कम मैं रेडियों स्टेशन पर तो आ सकी| इतना कहकर  वह पानी पीने के लिए चली गई|
उसके जाने के बाद सुमित ने शुभांगी को भी धन्यवाद कहा और उसके शो के बारे में पूछा
सुमित –फहराना के चेहरे पर दिख रही मुस्कराहट से तो लग रहा है जैसे तुम्हारा शो काफी अच्छा रहा है ?
शुभांगी – यार शो तो बहुत अच्छा था पर मेरी एक बात समझ में नहीं आई फरहाना ने जितने भी गाने चुने वह सब दर्द भरे थे, सेंटी टाइप के गाने थे एक भी गाना उसने रोमांटिक नहीं चुना........क्या उसे डाँस ...धमाल के गाने पसंद नहीं है?
सुमित – अरे यार ऐसा नहीं है उसे डाँस के गाने भी बहुत पसंद हैं यहाँ तक कि वह अच्छा नाचती भी है पर .......
शुभांगी – पर क्या सुमित ?
सुमित - असल में उसे कैंसर है और वह भी लास्ट स्टेज का| डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है  कि अब वह इस संसार में कुछ ही दिनों की मेहमान है|
फरहाना को कैसर होने की बात सुनकर शुभांगी चौक गई| उसे सुमित की कही बात पर विश्वास नहीं हो रहा था| उसे लगा जैसे वह उसके साथ मज़ाक कर रहा है| फरहाना के व्यवहार से कतई नहीं लगता कि वह इस संसार में कुछ ही दिनों की मेहमान है| सुमित ने उसे बताया -
 
सुमित – मुझे भी जब इस बात का पता चला तब मुझे भी अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ पर यह सच है कि उसे कैंसर है और वह भी लास्ट स्टेज का| उसके मुस्कुराते चेहरे के पीछे का सबसे बड़ा दुःख यही है| लेकिन उसने आज तक किसी के सामने अपने इस दुःख को नहीं बताया| उसने अपनी इस बीमारी के बारे में  मुझे भी कुछ नहीं बताया| जब वह हॉस्पिटल में थी तब एक दिन में उससे मिलने गया था| मैंने डॉक्टर से बात की तब पता चला कि उसे कैंसर है|

आज रेडियो स्टेशन पर फरहाना के जीवन के इस राज को जानकर शुभांगी का दिल भर  आया| उसके मुस्कुराते हुए चेहरे के पीछे कितना दुःख –दर्द छिपा था आज पता चला| इस संसार में ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने दुःख-दर्द को अपने अंदर ही अंदर समेटे हुए दूसरों को सदैव खुश रखने का प्रयास करते हैं| उन्हीं में से फरहाना भी एक है| उसकी अपनी कोई संतान नहीं है| उसे अपने जीते जी अभी बहुत सारे काम करने हैं| उन बच्चों के लिए जो उसके अपने तो हैं नहीं पर शायद भगवान ने उसकी ममता को देखते हुए उसकी झोली में इतने बच्चों को दे दिया मातृत्व सुख पाने के लिए| उसे पता है कि अब उसे कोई भी दवा इस संसार में नहीं बचा सकती| फिर भी अपने जीवन के इन अंतिम क्षणों में उसने अपना इलाज इस लिए जारी रखा है कि शायद कोई चमत्कार हो जाए और उसे अपने जीवन का वह लम्हा मिल जाए जिससे आज तक वह वंचित है| उसे पता है वह कभी भी इस संसार से विदा हो सकती है फिर भी अपने जीवन के बचे हुए दिनों के हर लम्हें को कुछ इस तरह जीना चाहती है जिससे उसके जाने के बाद भी लोग उसे याद रखें|

हम लोग अपने जीवन के एक-एक लम्हे का मोल नहीं समझते| उसे यूँ ही बातों में, व्यर्थ के कामों में व्यतीत कर देते हैं| लेकिन जब हमें अपने जीवन के बीते हुए हर लम्हे का अहसास होता है शायद तब तक बहुत देर हो चुकी होती है| जीवन का हर लम्हा बहुत ही कीमती है और फरहाना जैसे लोग अपनी इतनी तकलीफों के बीच भी खुशी का एक-एक लम्हा खोज कर उसे जी भरकर जी लेना चाहते हैं ... न जाने खुशियों के ये लम्हे  कल मिले ना मिले ..........

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